21वीं सदी में राष्ट्र और राष्ट्रीय सुरक्षा की अवधारणा का पुनर्परिभाषिकरण एवं नए प्रतिमानों की स्थापना

Authors

  • Dr. Arvind Kumar 21वीं सदी में राष्ट्र और राष्ट्रीय सुरक्षा की अवधारणा का पुनर्परिभाषिकरण एवं नए प्रतिमानों की स्थापना

DOI:

https://doi.org/10.5281/zenodo.23184867

Keywords:

राष्ट्र की अवधारणा, राष्ट्रीय सुरक्षा, सुरक्षा दुविधा यथार्थवाद– अस्पष्ट प्रतीक, संज्ञानात्मक संप्रभुता

Abstract

प्रस्तुत शोध पत्र समकालीन वैश्विक परिदृश्य में 'राष्ट्र' और 'राष्ट्रीय सुरक्षा' की ज्ञानमीमांसा (Epistemology) का एक आलोचनात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। सूचना क्रांति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के शस्त्रीकरण, और 'हथियारबंद अंतर्निर्भरता' (Weaponized Interdependence) के इस दौर में स्वयं 'राष्ट्र' की अवधारणा पारंपरिक सांस्कृतिक और भू-राजनीतिक सीमाओं से परे एक डिजिटल व वैचारिक इकाई के रूप में पुनर्गठित हो रही है, जिससे पारंपरिक वेस्टफेलियन (Westphalian) सीमा-केंद्रित सैन्य मॉडल अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। गुणात्मक और विश्लेषणात्मक शोध पद्धति (Qualitative and Analytical Methodology) का उपयोग करते हुए, यह लेख अर्नोल्ड वोल्फर्स के 'अस्पष्ट प्रतीक' (Ambiguous Symbol) और बैरी बुज़ान के 'अविकसित अवधारणा' (Underdeveloped Concept) के शास्त्रीय सिद्धांतों का पुनरीक्षण करता है ताकि बदलते दौर में राष्ट्र के अस्तित्व और उसकी सुरक्षा को नए सिरे से समझा जा सके। शोध में पाया गया है कि यथार्थवादी (Realist) और आदर्शवादी (Idealist) दृष्टिकोणों के पारंपरिक द्वंद्व के कारण उत्पन्न 'सुरक्षा दुविधा' (Security Dilemma) अब भौतिक सीमाओं से आगे बढ़कर राष्ट्र की 'संज्ञानात्मक संप्रभुता' (Cognitive Sovereignty) और डेटा स्पेस तक विस्तृत हो गई है। निष्कर्षत यह शोध पत्र एक 'त्रि-आयामी व्यापक सुरक्षा मॉडल' (3D Comprehensive Security Model) का प्रस्ताव करता है, जो नए युग के हाइब्रिड और गैर-पारंपरिक खतरों से निपटने तथा आधुनिक राष्ट्र के वजूद को सुरक्षित रखने के लिए एक बहुआयामी और लचीला ढांचा स्थापित करने में सक्षम है।

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Published

2026-10-06

How to Cite

Dr. Arvind Kumar. (2024). 21वीं सदी में राष्ट्र और राष्ट्रीय सुरक्षा की अवधारणा का पुनर्परिभाषिकरण एवं नए प्रतिमानों की स्थापना International Journal of Management, Engineering and Social Sciences,3(1), 67-75.
https://doi.org/10.5281/zenodo.23184867

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Articles